अनूपजी, मैंने इधर एक नई कविता लिखी है.
सुनाओ भाई अभिनव, बहुत दिन हुए तुम्हारी कविता सुने.
नहीं... कविता नहीं.. अब और नहीं...
अरे! अथर्व को क्या हो गया, वैसे अभिनव की कविता सुनकर मेरा मन भी कुछ यही बोल रहा था ;)
आजा बेटा ताउजी के पास आजा, आज तुमने मुझे बोर होने से बचा लिया, चलो मैं तुमको घुमाने ले चलता हूँ.
लेकिन चलने से पहले सब लोग एक फोटो तो खिंचवा लें.
चलो आज तो धूप खिल आई है, सिएटल घूमने का मज़ा आएगा.
ये ज्ञानेश ऊपर क्या देख रहे हैं?
सबसे पहले पार्क में घुमते हैं, ये क्या अथर्व अभी से जम्हाई ले रहे हैं..
हम यहाँ .. तुम कहाँ ..
पीछे है सिएटल का प्रमुख पुस्तकालय
दस मंजिला पुस्तकालय अपनी पुस्तकों के अतिरिक्त अपने अनूठे शिल्प के लिए भी जाना जाता है.
बड़ा ज़बरदस्त पुस्तकालय बन गया है मजाक मजाक में.
पुस्तकालय के भीतर - दसवीं मंजिल
ठण्ड होने लगी है, बस के भीतर भी छोटे लाल खूब कपड़े लपेटे हैं.
नमस्कार चिडिया वाले भाईसाहब, यहाँ कुछ खाने को मिलेगा क्या?
बरसात के मौसम में पकौडों का मज़ा ही कुछ और होता है.
साथ में हाट चाकलेट हो तो कहने ही क्या हैं..
चलो अब चिडियों को भी कुछ खिलाया जाए..
मुंह खोल कर इंतज़ार में बैठा है ये समुद्री पक्षी, पर अनूपजी का ध्यान किधर है?
क्या भाई अब दांत साफ़ करोगे क्या..
भाव भंगिमा - 1
भाव भंगिमा - 2
भाव भंगिमा - 3
भाव भंगिमा - 4
भाव भंगिमा - 5
भाव भंगिमा - 6
भावः भंगिमा - 7
भावः भंगिमा - 8
भाव भंगिमा - फोटोग्राफर के साथ :)
हम साथ साथ हैं...
मछलियाँ तो बहुत देख लीं अब कुछ खाने पीने का इंतजाम किया जाए.
सिएटल के ऐतहासिक पाइक प्लेस मार्केट के सामने.
ये तिब्बत हमारा है, तुम इसको छोड़ दो, मार्केट के पास कुछ लोग प्रदर्शन करते हुए.
नाम हो चाहे मछलीमार, बार हर बार, लेकिन अनूपजी नें काफी पीने की इच्छा ज़ाहिर की..
ये स्टारबक्स की सबसे पहली दूकान है.
ई कविता पर कांफ्रेंस शुरू करते हुए अनूप भार्गव जी
काव्य गोष्ठी के समापन पर सभी के चेहरों पर ख़ुशी छलक आई :)